लोकतंत्र मे भीड़तंत्र और भारत की दिशा

लोकतंत्र में भीड़ तंत्र

       कैसी है ये भीड़ तंत्र और कैसा इसका जाल
        प्रजा तंत्र के गले में चुभती नश्तर जैसी वार|

                   मानव हमेशा ही अपनी सुरक्षा के लिए एक सामाजिक घेरे का निर्माण करता आया है, लेकिन जिस तरह से समूह का लक्षण एक उन्मादी भीड़ में बदलता जा रहा है उससे सुरक्षा की जगह असुरक्षा ने ले ली है और लोकतंत्र मे भीड़ तंत्र का समावेश हुआ है|

  • हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में भीड़ द्वारा की गई हिंसक घटनाओं की निंदा करते हुए केंद्र/राज्यों को दिशा निर्देश दिया तथा संसद में इसके लिए कानून बनाने के लिए कहा और केंद्र/राज्य से इसके लिए 4 हप्तो मे रिपोर्ट माँगा|
  •  पिछले 2 महीनों में 17 लोगों की हिंसक भीड़ द्वारा हत्या हुई और सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों के चलते 28 लोग हिंसक भीड़ के शिकार हुए|
  •  बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के बीच बढ़ते अविश्वास के कारण दोनों वर्गों में असुरक्षा की भावना का होना स्वभाविक है, जिससे इन्हें मौका मिलने पर वह एक दूसरे के खिलाफ भीड़ का इस्तेमाल करते हैं|
  •  राजनीतिक दलों द्वारा भी अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए भीड़ तंत्र का सहारा लिया जाता रहा है, कभी धर्म के नाम पर तो, कभी आरक्षण के नाम पर जिस से काफी हिंसात्मक कृत्य हुए हैं|

 

न्यायालय ने इस संबंध में कहा

  कोई भी नागरिक अपने आप में कानून नहीं बन सकता| लोकतंत्र में भीड़ तंत्र की इजाजत नहीं दी जा सकती|
 सुप्रीम कोर्ट के द्वारा सोशल मीडिया पर भड़काऊ भाषण,  संदेश तथा वीडियो इत्यादि को लेकर भी निगरानी करने का निर्देश दिया है|

 

            आई पी सी में लिंचिंग से संबंधित घटनाओं के लिए नए प्रावधान नहीं है, इन्हें सामान्य धाराओं जैसे 302( हत्या), 307(हत्या का प्रयास), 323(जानबूझकर घायल करना) 147-148(दंगा फसाद), 149 (आज्ञा के विरुद्ध इकट्ठे होना) आदि धाराओं के द्वारा ही निपटारा किया जाता है|         

           देश में कानून पर्याप्त होने पर भी इसका ईमानदारी पूर्वक पालन ना होने पर अपराधों की प्रवृत्ति बढ़ी है इसके पालन की जिम्मेदारी व्यवस्थापिका की होती है, लेकिन कार्यकारी स्तर पर लोच के कारण इसके अच्छे परिणाम नहीं प्राप्त हुए और इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप भी बड़ा कारण रहा है। 

                 वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से विद्यमान कानूनों में परिवर्तन के साथ ही पुराने कानूनों का कड़ाई से पालन आवश्यक है और आम हत्या और भीड़ द्वारा की गई हत्या को अलग-अलग परिभाषित करनेकी भी जरूरत है और सोशल मीडिया पर फैले अफवाह के बारे में लोगों को जागरूकता की आवश्यकता है की बिना परखे किसी न्यूज़ को आगे प्रेसित ना करें|
         कोई भी नागरिक अपने आप में कानून नहीं बन सकता और लोकतंत्र में भीड़ तंत्र की इजाज़त नहीं दी जा सकती, और सुप्रीम कोर्ट के द्वारा सोशल मीडिया पर भड़काऊ भाषण, संदेश तथा वीडियो इत्यादि को लेकर भी निगरानी करने का निर्देश दिया है।

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